Top 5 Mistakes Taxpayers Make While Filing Income Tax Return (ITR)
जैसे-जैसे इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) फाइल करने का सीजन नजदीक आता है, टैक्सपेयर्स अक्सर जल्दबाजी में बिना पूरी सटीकता और जांच-परख के अपना रिटर्न दाखिल करने की कोशिश करते हैं। हालांकि ऑनलाइन फाइलिंग की प्रक्रिया अब काफी आसान और सुविधाजनक हो गई है, लेकिन इसके बावजूद छोटी से छोटी गलती भी आपको आयकर विभाग का नोटिस दिला सकती है, रिफंड में देरी करा सकती है, या आपके रिटर्न को डिफेक्टिव (Defective Return) बना सकती है।
कई टैक्सपेयर्स पूरी तरह से प्रीफिल्ड (पहले से भरे हुए) डेटा या सीमित दस्तावेजों पर भरोसा कर लेते हैं और मान लेते हैं कि यह प्रक्रिया बेहद सरल है। लेकिन वास्तविकता यह है कि रिटर्न फाइल करने से पहले सावधानीपूर्वक समीक्षा और सही मिलान (Reconciliation) करना बेहद जरूरी है।
नीचे उन 5 सबसे आम गलतियों के बारे में बताया गया है जो टैक्सपेयर्स अक्सर ITR फाइल करते समय करते हैं और जानें कि इनसे कैसे बचा जा सकता है।
1. गलत ITR फॉर्म का चुनाव करना (Choosing the Wrong ITR Form)
गलत ITR फॉर्म चुनना टैक्सपेयर्स द्वारा की जाने वाली सबसे आम और गंभीर गलतियों में से एक है। आयकर विभाग ने आय के स्रोत (Source of Income), आवासीय स्थिति (Residential Status) और वित्तीय खुलासों के आधार पर अलग-अलग ITR फॉर्म निर्धारित किए हैं।
कई वेतनभोगी (Salaried) व्यक्ति यह मान लेते हैं कि उनके मामले में हमेशा ITR-1 (Sahaj) ही लागू होगा। लेकिन यदि किसी टैक्सपेयर को कैपिटल गेन्स (म्यूचुअल फंड या शेयर्स से कमाई), विदेशी संपत्ति, किसी कंपनी में डायरेक्टर्सिप, या एक से अधिक घर से प्रॉपर्टी इनकम है, तो वे ITR-1 फाइल करने के पात्र नहीं होते।
उदाहरण: एक सैलरी पाने वाला कर्मचारी जिसे म्यूचुअल फंड या इक्विटी शेयरों की बिक्री से कैपिटल गेन भी हुआ है, वह गलती से ITR-1 फाइल कर देता है, जबकि उसे ITR-2 चुनना चाहिए था। ऐसी स्थिति में रिटर्न को 'डिफेक्टिव' मानकर नोटिस जारी किया जा सकता है, जिससे आपका कम्प्लायंस बोझ बढ़ जाता है। इसलिए फाइल करने से पहले अपनी पात्रता जरूर चेक करें।
2. AIS, TIS और Form 26AS का मिलान न करना
दूसरी बड़ी गलती यह है कि टैक्सपेयर्स रिटर्न दाखिल करते समय केवल Form 16 पर भरोसा कर लेते हैं और **Annual Information Statement (AIS)**, **Tax Information Statement (TIS)** तथा **Form 26AS** के साथ डेटा का मिलान (Reconciliation) करना भूल जाते हैं।
आयकर विभाग अब आपके लगभग हर बड़े वित्तीय लेनदेन को ट्रैक करता है, जैसे:
- सेविंग्स अकाउंट और फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) पर मिला ब्याज
- डिविडेंड (लाभांश) से हुई कमाई
- म्यूचुअल फंड रिडेम्पशन (बिक्री) के ट्रांजैक्शन
- शेयर ट्रेडिंग से जुड़े लेनदेन
- हाई-वैल्यू वित्तीय लेनदेन और TDS/TCS का विवरण
अक्सर बैंक सेविंग्स या एफडी के ब्याज पर टीडीएस नहीं काटते, जिसके कारण यह जानकारी Form 16 में नहीं आ पाती और टैक्सपेयर्स इसे ITR में दिखाना भूल जाते हैं। जब यह अघोषित आय विभाग के AIS डेटा से मैच नहीं होती, तो सीधे स्क्रूटनी या रिफंड रुकने का नोटिस आ जाता है। इसलिए फाइलिंग से पहले AIS का मिलान एक अनिवार्य कदम होना चाहिए।
3. बिना तुलना किए गलत टैक्स रीजीम चुन लेना
वर्तमान में टैक्सपेयर्स के पास दो विकल्प मौजूद हैं—ओल्ड टैक्स रीजीम (Old Tax Regime) और न्यू टैक्स रीजीम (New Tax Regime)। अक्सर लोग बिना कैलकुलेशन किए किसी भी एक रीजीम को डिफॉल्ट रूप से चुन लेते हैं, जो उनके लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है।
नई टैक्स रीजीम में टैक्स स्लैब की दरें कम हैं, लेकिन इसमें Section 80C, 80D, हाउस रेंट अलाउंस (HRA) और होम लोन के ब्याज जैसी प्रमुख कटौतियां और छूट नहीं मिलती हैं। वहीं दूसरी ओर, ओल्ड रीजीम इन सभी निवेशों पर टैक्स बचाने की आजादी देती है।
उदाहरण: यदि एक कर्मचारी ने Section 80C में बड़ा निवेश किया है, मेडिकल इंश्योरेंस प्रीमियम चुकाया है और वह भारी HRA क्लेम कर रहा है, तो उसके लिए ओल्ड रीजीम अधिक फायदेमंद हो सकती है। इसके विपरीत, जिस व्यक्ति का कोई निवेश नहीं है, उसके लिए न्यू रीजीम बेहतर हो सकती है। अंतिम निर्णय लेने से पहले दोनों रीजीम के तहत टैक्स की गणना करके तुलना अवश्य करें।
4. गलत कटौतियां क्लेम करना और छोटी आय को छुपाना
कई टैक्सपेयर्स या तो बिना पुख्ता दस्तावेजों के गलत कटौतियां (Deductions) क्लेम कर लेते हैं या फिर ऐसी आय को रिपोर्ट नहीं करते जो उन्हें छोटी या महत्वहीन लगती है।
टैक्सपेयर्स अक्सर पीपीएफ (PPF) ब्याज, कृषि आय या टैक्स-फ्री बॉन्ड्स से मिलने वाली आय को पूरी तरह से छोड़ देते हैं, यह सोचकर कि जब इस पर टैक्स लगना ही नहीं है तो इसे क्यों दिखाना। लेकिन कानूनन टैक्स-फ्री या एक्सेम्प्ट इनकम (Exempt Income) को भी ITR के निर्दिष्ट शेड्यूल में घोषित करना अनिवार्य है।
इसके अलावा फ्रीलांसिंग से हुई छोटी कमाई, साइड इनकम, सेविंग्स बैंक का ब्याज या डिविडेंड जैसी छोटी राशियों को छोड़ना भी भारी पड़ सकता है, क्योंकि यह सारा डेटा विभाग के पास पहले से उपलब्ध होता है।
5. फाइलिंग के बाद रिटर्न को वेरिफाई न करना (Not Verifying ITR)
यह सबसे ज्यादा अनदेखी की जाने वाली गलती है। कई लोग समझते हैं कि पोर्टल पर रिटर्न 'सबमिट' या अपलोड करते ही उनका काम पूरा हो गया।
सिर्फ रिटर्न अपलोड करने से प्रक्रिया पूरी नहीं होती। फाइल करने के बाद निर्धारित समयसीमा के भीतर इसका **ई-वेरिफिकेशन (e-Verification)** करना अनिवार्य है। आप इसे वन-टाइम पासवर्ड (OTP), नेट बैंकिंग, या बैंक अकाउंट वैलिडेशन के जरिए आसानी से कर सकते हैं।
यदि आप तय समय के भीतर अपने ITR को ई-वेरिफाई नहीं करते हैं, तो आयकर विभाग आपके रिटर्न को अमान्य (Invalid) घोषित कर देता है। इसका सीधा मतलब यह निकाला जाता है कि आपने उस साल का रिटर्न भरा ही नहीं है, जिसके बाद आपको लेट फाइलिंग फीस और ब्याज जैसी कानूनी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है।
निष्कर्ष (Conclusion)
इनकम टैक्स रिटर्न दाखिल करना केवल एक कागजी खानापूर्ति नहीं है, बल्कि यह एक महत्वपूर्ण वित्तीय जिम्मेदारी है जिसमें सटीकता और सही खुलासे की आवश्यकता होती है। गलत फॉर्म चुनना, AIS का मिलान न करना, अनुपयुक्त टैक्स रीजीम का चयन करना, छोटी आय को छुपाना या वेरिफिकेशन न करना जैसी गलतियां आपको बड़ी मुसीबत में डाल सकती हैं। इन सभी गलतियों से बचने के लिए आखिरी तारीख का इंतजार न करें और समय रहते पूरी जांच-परख के साथ अपना त्रुटिहीन रिटर्न फाइल करें।
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